वस्तु और सेवा कर का लागु होना भारतीये अर्थव्यवस्था
के इतिहास में एक ऐसा क्रन्तिकारी घटना है जो व्यक्ति के आर्थिक जीवन के सभी पहलु को किसी न किसी
प्रकार से प्रभावित करेगा। अर्थतंत्र के सरलीकरण तथा
एकल राष्ट्र कर के परिणाम से कर प्रशासन में जो पारदर्शिता आएगी उसका लाभ
अप्रत्यक्ष कर तक ही सिमित नहीं रहेगा, निःसंदेह यह
प्रत्यक्ष कर को भी सकारात्म रूप से प्रभावित करेगी । 1954 में फ्रांस से शुरू हुई जीएसटी, कंसल्टिंग कंपनी
डेलॉइट के अनुसार आज विश्व में लगभग 160 देशों में किसी का न किसी रूप में लागू है, यह बात उल्लेखनिये है कि फ्रांस में इसे
लागु करने के पीछे मुख्य कारण था कर-वंचन में कमी लाना।
वस्तु और सेवा के लेन देन पर अप्रत्यक्ष कर लगाया
जाता है और इसी लेन-देन से होने वाली लाभ पर प्रत्यक्ष कर जैसे की कॉर्पोरेट कर या आयकर लगाया जाता
है। इसे और स्पष्ट शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि अगर कोई वस्तु का विक्रय
मूल्य 100 रूपया है तो उस पर खरीदने वाले व्यक्ति को पूरा
विक्रय मूल्य पर अप्रत्यक्ष कर देना होगा वहीँ बेचने वाले को इस लेनदेन से होने
वाला लाभ पर प्रत्यक्ष कर अर्थात आयकर देना होगा। इस प्रकार प्रत्येक लेनदेन पर
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का भुगतान करना पड़ता है, यद्यपि
करों का बोझ अलग-अलग व्यक्ति पर होता है। इन्ही तरह के लेनदेन की प्रक्रिया को जब
आयकर अधिकारी से छुपाया जाता है तब कालेधन की उत्पत्ति होती है। वर्ष 2012 में संसद में प्रस्तुत किये गए अपने श्वेत पत्र में सीबीडीटी ने कालेधन को ऐसे संपत्तियों या संसाधनों के रूप
में परिभाषित किया है, जिनकी सुचना न तो उनके अर्जन के समय और न ही अधिपत्य के समय सरकारी
विभाग को दी जाती है। कालाधन
क़ानूनी और गैरकानूनी दोनों ही तरिके से अर्जित किया जा सकता है।
आर्थिक लेनदेन को छुपाने से उपजा कालाधन का
दूष्प्रभाव ये है कि 31 मार्च 2014 तक भारत में पंजीकृत की गई 13.94 लाख कंपनियों में से केवल 5.97 लाख कंपनियां ने
निर्धारण वर्ष 2016-17 के लिए अपना आयकर रिटर्न भरा है,
जिसमें 2.76 लाख कंपनियों ने या तो नुकसान या
फिर शून्य आय दिखाया है। इन तरीकों से पैदा किया गया धन का उपयोग भी इस तरह किया जाता है कि कानून लागू करने वाली संस्था को
इसकी जानकारी न लगे, इस तरह से कालेधन का एक ऐसा दुष्चक्र
पैदा होता है जो कभी खत्म नहीं होता है। ऐसे कंपनियों अपने यहाँ काम कर रहे कर्मचारियों को भी उनका वेतन नगदी में देती है जिसका दुष्परिणाम ये है
कि संगठित क्षेत्र के रोजगार में लगे 4.2 करोड़ लोगों में केवल 1.74 करोड़ व्यक्ति ही अपने वेतन
आय पर आयकर भरते हैं। जी एस टी कर-व्यवस्था में आमूलचूक परिवर्तन लाएगी जिससे
कर-वंचन के तरीकों पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
जीएसटीएन द्वारा लेनदेन का पूरा ट्रेल रखना
कालेधन का सबसे बड़ा श्रोत नगदी आधारित लेनदेन होता है
क्यूंकि कैश अपने पीछे कोई निशान (ट्रेल) नहीं छोड़ती है। प्राइसवाटरहाउस कूपर्स ने 2015 में एक रिपोर्ट में
कहा था कि भारत में मूल्य के आधार पर 98 प्रतिशत
और मात्रा के आधार पर 68 प्रतिशत लेन-देन उपभोक्ता
नकद में करते हैं जो
की तुलनीय अर्थव्यवस्थाओं, जैसा की चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका इत्यादि से काफी अधिक है।
नकदी में की गयी लेनदेन के निशान को ट्रैक करने के लिए प्रभावी
तंत्र की अनुपस्थिति के कारण, ये नकदी के लेनदेन एक ऐसा समानांतर अर्थव्यवस्था पैदा करती है जो कि देश
की मुख्य धारा अर्थव्यवस्था से भी बड़ा है। विमुद्रीकरण के बाद सरकार ने नकद-रहित लेनदेन को सुविधाजनक बनाने और प्रोत्साहन देने की कोशिश
की है और सकारात्मक परिणाम भी दिखें हैं, लेकिन भारत
जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र में नकदीरहित अर्थव्यवस्था
का परिकल्पना को पूर्णरूप से धरातल पर लाने में वक़्त
लगेगा। जीएसटी ने इन नकद आधारित लेनदेन पर नज़र रखने के लिए एक विकल्प प्रदान किया
है। कालाधन को नियंत्रित करने के लिए सामान्य तौर पर कैश-ट्रेल को ट्रैक किया जाता
है जो बहुत कठिन कार्य होता है, जीएसटी अपने अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अवसंरचना ‘वस्तु और सेवा
कर नेटवर्क’ (जीएसटीएन) के जरिये लेनदेन की पूरी श्रंखला का ट्रैक रखेगी। एक मजबूत और व्यापक सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली भारत में जीएसटी व्यवस्था की नींव होगी इसलिए पंजीकरण, रिटर्न, भुगतान आदि जैसी सभी कर भुगतान सेवाएं करदाताओं को ऑनलाइन उपलब्ध होंगी, जिससे
इसका अनुपालन बहुत सरल और पारदर्शी हो जायेगा। कागजी रिटर्न नहीं भरे जा सकेंगे। सभी टैक्स भुगतान
ऑनलाइन होंगे। एक-दूसरे से नहीं मिलने वाले रिटर्न ऑटो-जेनरेट होंगे और अधिकारीयों
को इसकी जानकारी दी जाएगी ।
जीएसटी इनपुट क्रेडिट के तर्ज पर बना हुआ एक ऐसा
व्यवस्था है जहाँ प्रत्येक चरण पर भुगतान
किये गये इनपुट करों का लाभ मूल्य-संवर्धन के बाद के चरण में उपलब्ध होगा। अतः जीएसटी विनिर्माताओं से लेकर उपभोक्ता तक वस्तु के
आदान प्रदान का ट्रैक रखेगा। समुचित
जीएसटी रिटर्न भरना सिर्फ वैधानिक आवश्यकता ही नहीं है अपितु व्यवसयीक मजबूरी भी
है। जो व्यपारी अथवा सेवाप्रदाता अपना
जीएसटी रिटर्न सही से नहीं भरेंगे उनसे जो व्यापारी वस्तु खरीद कर ले जायेंगे, जीएसटी सिस्टम उनको इनपुट क्रेडिट
नहीं देगा, इस तरह टैक्स नहीं भरने वाले व्यपारियों से
लेनदेन करने वाले व्यपारियों को काफी नुकसान होगा। साथ ही साथ जीएसटीएन ऐसे लेनदेन जो तत्काल ही
फ्लैग कर के टैक्स अधिकारीयों के जानकारी में इस बात को लाएगा। जीएसटी से
पहले ऐसा व्यवस्था उपलब्ध नहीं था,
लेनदेन का समुचित ट्रेल उपलब्ध नहीं था, जिसके
के कारण टैक्स अधिकारी कभी कभी अपने आप को असहाय पाते थे।
8 नवंबर
2016 को माननिये प्रधानमंत्री के घोषणा के बाद मध्यरात्रि तक
सैकड़ों ज्वैलर्स दुकान वालों ने 12 बजे रात तक अपने बही खाते
में हज़ारों बिल कैश में काटे और ये सभी बिल रूपये 2 लाख से
कम के बिल थे ताकि पैन नंबर देने की जरुरत न पड़े। सोने-चाँदी के दुकानदारों ने ही
नहीं अपितु दूसरे महँगे वस्तुओं के
विक्रेताओं ने भी ऐसा किया। जाँच के दौरान ऐसा पाएगा की इन व्यपारियों ने ये बिल
बिना किसी वास्तविक लेनदेन के फाड़े थे, अर्थात व्यपारियों के
पास सोना-चाँदी का कोई स्टॉक नहीं था फिर भी अपने पास या किसी और के पास रखे कालेधन को मुख्यधारा में लाने के लिए ये
बिल फाड़े गए थे, और बाद में इन व्यपारियों ने एक दूसरे से
मिल कर पूर्व के तिथि में फर्जी बिल बना कर बोगस स्टॉक बना लिया था चूकिं ये सब
लेनदेन को या तो कैश में या क्रेडिट में करता हुआ दिखाया गया था इसलिए इनका कोई ट्रेल
ढूंढन आसान नहीं था। जीएसटी आने के बाद पूर्व के तिथि (बैक डेट) में बिल बनाना शयद
नामुमकिन होगा।
जहाँ एक ओर जीएसटी के माध्यम से व्यपारियों के
कर-वंचना को नियंत्रित किया जायेगा वहीँ दूसरी और बैंक के खातों और पैन को आधार से
जोड़ने से और साथ ही साथ रूपये 50,000/- से अधिक के लेनदेन के लिए आधार की अनिवार्यता से ग्राहकों के कालाधन पर
नज़र रखा जायेगा।
जीएसटीएन का एक दूसरा महत्वपूर्ण फ़ायदा यह होगा की यह
अधिकारीयों और करदतों के बीच के इंटरफ़ेस को लगभग खत्म सा कर देगा, परिणाम स्वरुप भर्ष्टाचार में कमी
आएगी। भर्ष्टाचार और कालाधन एक दूसरे के पूरक हैं। ये एक दूसरे का
समर्थन और संवर्धन करते हैं।
सुचना प्रौद्योगिकी पर आधारित जीएसटीएन प्रणाली एक ऐसा
डेटाबेस के निर्माण के तरफ एक महत्वपूर्ण कदम है जो बटन के एक क्लिक पर कई प्रशासनिक डाटाबेसों जैसे कि
आयात, निर्यात, आरबीआई, बैंकों और आयकर विभाग के डेटाबेस में से किसी भी व्यक्ति के आर्थिक क्रियाकल्पों का पूर्ण लेखा-जोखा तैयार कर के दे देगा।
समायोजी प्रविष्टियां (एकोमोडेशन एंट्रीज) पर नियंत्रण
आज भारत में
लोगों का एक ऐसा नेटवर्क काम कर रहा है जो व्यवसायी प्रतिष्ठानों को फ़र्ज़ी
खर्चे के बिल बना कर कमीशन पर बेचते हैं, ताकि
ऐसे व्यवसायी प्रतिष्ठान अपना लाभ को कम कर के उसपर अपना टैक्स बचा सकें । ये
नेटवर्क इतना बड़ा हो चूका है कि ये अपने-आप में एक उद्योग का रूप ले चूका है। कोलकत्ता शहर में इस तरह के फ़र्ज़ी बिल बनाने
वाले सबसे अधिक सक्रिय हैं। दिल्ली शहर का
नया बज़ार, लक्ष्मीनगर जैसे क्षेत्र में ये बिल फाड़ने का काम
धरल्ले से होता है। ये लोग अपने ग्रहकों
को हर तरह का बिल मुहैया करवाते हैं। इस
तरह के लेनदेन को असलियत का रूप देने के लिए बैंक खातों के माध्यम से पैसों का
लेनदेन भी दिखाया जाता है। बिल फाड़ने वाला उद्योग आज हज़रों करोड़ का हो चूका
है। कानून लागु करने वाली एजेंसी जैसे
आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय, केन्द्रीय
अन्वेषण ब्यूरो, गंभीर कपट अन्वेषण कार्यालय आदि लागतार इस तरह के संस्था को कानूनी रूप से नियंत्रित करने का प्रयास
कर रही है। इस तरह के काम में जो कंपनियां
लगी रहती है उसे शेल कंपनी कहते हैं। शेल
कंपनियों पर करारा प्रहार करने हेतु सभी कानून लागु करने वाली संस्था और कंपनी
मामलों का मंत्रालय मिलकर काम कर रहे हैं जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में
इन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए एक उच्च स्तरीय कार्यबल का गठन किया गया
है। इस तरह के एक लाख कंपनियों को अपंजीकृत कर दिया गया है और विभिन्न वैधानिक
अधिनियम के तहत इन पर कार्यवाही की जा रही है।
जीएसटी इस तरह के शेल कंपनियों पर नकेल कसने के
प्रयास में एक बहुत ही उपयोगी कानून सिद्ध होगा।
ये कंपनियां अपने ग्राहकों को फ़र्ज़ी बिल देते हैं जबकि उस बिल से सम्बंधित
कोई वास्तविक लेनदेन नहीं होता है। अब जब
ये कंपनियां ऐसे बिल फाड़ेंगे और उसे अपने जीएसटी रिटर्न भरने के दौरान जीएसटीएन पर
डालेंगे, जीएसटीएन अपने आप ऐसे लेनदेन को
फ्लैग कर देगा क्यूंकि ऐसे बिल से सम्बंधित कोई इनपुट बिल सिस्टम पर होगा ही
नहीं। इस
बात को ऐसे समझा जा सकता है कि अगर कोई व्यवसायी विनिर्माण क्षेत्र में काम करता है तो उसे कच्चे माल की
आवश्यकता होगी और अगर वो थोक अथवा खुदरा विक्रेता होगा तब भी उसे किसी दूसरे से
माल खरीदना होगा, दोनों हो स्तिथि में उसे इनपुट बिल चाहिए
होगी। और ऐसा नहीं होने पर उसके द्वार
किया गया लेनदेन मान्य नहीं होगा।
वैट में भी इनपुट क्रेडिट का प्रावधान था लेकिन
अंतर्राजीय लेनदेन में इनपुट क्रेडिट मैच करना आसान नहीं था, कर-वंचन करने वाले इसका दुर्पयोग
करते थे। चूकिं जीएसटी में इनपुट क्रेडिट
राष्ट्रीय स्तर पर मिलाया जायेगा अतः ऐसे दुर्पयोग की सम्भावना नहीं है।
कानून लागु करने वाली विभागों के बीच में बेहतर
समन्वयन
जीएसटी ने केंद्र, राज्यों और नगरपालिका के द्वारा लगाएजाने वाले लगभग 17 प्रकार के कर और
23 प्रकार के सेस
को अपने अंतर्गत किया है। ये कर केंद्र और राज्यों के अनेक विभागों द्वारा लगाया
जाता था। सामन्यतया इन विभागों के बीच में
किसी प्रकार का आंकड़े का आदान प्रदान नहीं होता था परिणाम स्वरूप जब कोई व्यपारी कर-वंचन करते हुए किसी एक विभाग
के द्वारा पकड़ा जाता था तब भी वह दूसरे विभागों के कानूनी प्रक्रिया से बच जाता
था। जीएसटी आजाने से निम्नलिखित
कारणों से ऐसा नहीं होगा।
1.
जीएसटी आने से अब
सिर्फ एक ही तरह का कर लगेगा, जिससे आयकर विभाग से कर सम्बन्धी जानकारी साझा करना
काफी आसान हो गया है
2.
जीएसटी पहचान
संख्या, आयकर विभाग के
पैन संख्या से जोड़ा गया और पैन पहले ही आधार से जुड़ चूका है, अतः किसी भी स्तर
पर किया गया कोई भी गड़बड़ी की जानकारी सभी
कानून लागु करने वाली संस्था के पास होगी।
3.
जीएसटी के भीतर
केंद्र और राज्यों के स्तर पर दोहरी
निगरानी ढांचा का व्यवस्था किया गया है। सभी डेटा राज्य के साथ ही केंद्र सरकार के
अधिकारियों के पास भी उपलब्ध रहेंगे। किसी भ्रष्ट प्रथा का मदद ले कर कुछ भी
छिपाना मुश्किल होगा। यहां तक कि अगर
टैक्स अधिकारियों का एक समूह कर चोरी का पता लगाने में विफल रहता है, तो संभावना यह है
कि अधिकारीयों का दूसर समूह उसे पता लगा लेगा। पकड़े जाने की संभावना जीएसटी
व्यवस्था में दोगुनी हो गयी है।
सेवा क्षेत्र में पारदर्शिता
सेवा-कर काल में, सेवा
प्रदाता (द्वितीय) को रिटर्न दाखिल करते समय किसी अन्य सेवा प्रदाता (प्रथम) को
पहले से भुगतान किए गए सेवा कर के बदले इनपुट क्रेडिट प्राप्त होता था लेकिन उसके
लिए ये जरुरी नहीं था कि दावा किया हुआ इनपुट क्रेडिट, सिस्टम
पर उपलब्ध हो। जीएसटी में सेवा प्रदाता को उतना ही इनपुट क्रेडिट दिया जाएगा जितना दावेदार के लिए उपलब्ध होगा। उपलब्ध और दावा किया गया इनपुट
क्रेडिट के बीच बेमेल के मामले में दो संभावनाएं हो सकती हैं या तो दूसरे सेवा
प्रदाता द्वारा किया गया दावा गलत है या पहले सेवा प्रदाता अपनी आय को छिपाकर
सेवा-कर और आयकर से बच रहा है। दोनों मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों को कर
चोरी की कोशिश के बारे में पता चल जायेगा।
रिवर्स चार्ज मैकेनाइजम (रिवर्स प्रभार तंत्र) के तहत, जो ग्राहक सेवा लेते हैं, सेवा कर का भुगतान करने की जिम्मेदारी उनपर होगी बजाय सेवा प्रदाता के। वे सेवाओं के लिए दिए गए मूल्य
पर जीएसटी अदा करेंगे और इस तरह यदि कोई सेवा प्रदाता अपनी आय छुपाने के लिए
जीएसटी रिटर्न नहीं दाखिल करता है, तब सेवा प्राप्तकर्ता
द्वारा दायर विवरण के आधार पर सिस्टम स्वतः उसे पहचान लेगा और इन सभी सूचनाओं को
आयकर विभाग के साथ साझा किया जाएगा। अगर
कोई पंजीकृत डीलर किसी अपंजीकृत डीलर से सेवा लेता है, तब उस
स्तिथि में पंजीकृत डीलर को प्राप्त किये गए सेवा के मूल्य पर रिवर्स चार्ज
मैकेनाइज्म के तहत जी एस टी अदा करना होगा।
इसी तरह यदि कोई ई-कॉमर्स ऑपरेटर सेवाएं प्रदान करता है तो रिवर्स चार्ज
ई-कॉमर्स ऑपरेटर पर लागू होगा। वह जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा।
उदाहरण के लिए, अगर कोई ई-कॉमर्स प्लेटफार्म प्लंबर, बिजली, शिक्षकों, आदि की सेवाएं प्रदान करता है तब उसपर रजिस्टर्ड सर्विस प्रोवाइडर्स के बजाय
ग्राहकों से जीएसटी इकठ्ठा कर जमा करवाने
की जिम्मेदारी है। इस तरह असंगठति क्षेत्र
को भी जीएसटी के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है।
इसी प्रकार यदि सेवा प्राप्तकर्ता, सेवा प्रदाता को किये गए भुगतान पर
टीडीएस (स्रोत पर काटा गया कर) काट कर आयकर विभाग में जमा कर देता है, और अगर वह सेवा प्रदाता जीएसटी का भुगतान नहीं कर रहा है, तब आयकर विभाग और जीएसटीएन के बीच डेटा साझा करने से कर चोरी की इस तरह की
कोशिशों की पहचान हो जाएगी ।
जीएसटी अनुपालन रेटिंग:
प्रत्येक व्यापारी को अपने जीएसटी के समय पर भुगतान
और टैक्स क्रेडिट के सही मिलान के लिए
मूल्यांकित किया जाएगा। खरीदार वैसे व्यापारी के साथ लेनदेन नहीं करेंगे, जिनकी अनुपालन रेटिंग कम है। इस
प्रकार कर-वंचन को प्रोत्साहित किया जायेगा ।
कर व्यवस्था के सरलीकरण से कर सम्बंधित कानून के
अनुपलन के कीमत में कमी आएगी। ऐसा
व्यवस्था लोगों को कर सम्बंधित नियमों का अनुपालन करने के लिए प्रोत्साहित करेगा ।
जीएसटी की वजह से कर वसूली बढ़ेगी तो भविष्य में इससे आयकर की दरों में कमी आसकती
है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि जीएसटी से जीडीपी में डेढ़ से दो प्रतिशत तक
बढ़ोतरी हो जाएगी। वो इसलिए ऐसा कह रहे हैं कि जीएसटी आने से देश में कारोबार का आकार बढ़ जाएगा ।
अर्थव्यवस्था वाइब्रेंट हो जाएगी और उसमें बहुत सकारात्मक बदलाव आएंगे। ऐसा होने
से राजकोष में वृद्धि होगी, परिणामस्वरूप
सरकार टैक्स दरों में कमी लाएगी जो एक ऐसा गुणी चक्र का निर्माण करेगा जिससे
कारोबार को बढ़ाबा मिलेगा और कर अनुपालन भी बढ़ेगा।
इससे टैक्स-जीडीपी अनुपात में बढ़ोत्तरी होगी।
जीएसटी का कार्यान्वयन प्रत्यक्ष कर के कर-आधार को
विस्तारित करने में और कर संग्रह में वृद्धि करने में मदद करेगा। अभी तक कर-वंचन को नियंत्रित के हेतु जो भी
कानून बने हैं, वो सभी कर-वंचन
के घटना का पोस्टमार्टम करते हैं अर्थात घटना के बाद उसमें संलिप्त लोगों पर
कानूनी कार्यवाही की जाती है, वहीँ जी एस टी एक ऐसा तंत्र है
जहाँ लोगों को कानून तोड़ते वक़्त ही पकड़ लेगा।
इस बात में कोई दो राय नहीं है कि जी एस टी, कर प्रणाली में अमूलचूक परिवर्तन
लाएगा विशेष रूप से कर संरचना और पारदर्शिता को लेकर जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव
कर-वंचन पर पड़ेगा । दूसरे कानून की तरह ही
जीएसटी भी आने वाले दिनों में विकसित (इवॉल्व) होगा और ऐसे क्षेत्र जो अभी इससे से बाहर हैं जैसा की रियल एस्टेट, जो की कालेधन पर गठित विशेष जाँच समूह के अनुसार सबसे अधिक कालाधन को सृजन
करती है, उन्हें जीएसटी के तहत लाकर के कालेधन के खिलाप चल
रही मुहीम को निर्णायक स्तर पर लेजाया
जायेगा।
योजना के अगस्त अंक में छपा लेख

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