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Showing posts from August, 2011

लोकपाल या लोकतंत्र ?

ये मैं नहीं कह रहा हूँ..मुझे ये भी नहीं पता है की आप ऐसा सोच रहे हैं या नहीं..राजपाल और राजतन्त्र में विरोध तो कोई नयी बात नहीं है पर..लोकपाल और लोकतंत्र में पहली बार विरोध दिख रहा है..लोकतंत्र का जन्म ही लोकपाल के लिए हुआ था फिर लोकपाल, लोकतंत्र का विरोधी कैसे? इसी सवाल से पिछले कई दिनों से जूझ रहा था..मन में कही न कही एक डर था की क्या सही में लोकतंत्र और लोकपाल एक साथ नहीं अस्तिव्त में आसकता.. फिर याद आया बचपन में नागरिकशास्त्र के शिक्षक महोदय अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के द्वारा दिया हुआ लोकतंत्र का परिभाषा सुनते थे "लोंगो के द्वारा, लोंगों के लिए, और लोंगों का"..फिर दिल को एक रहत सा मह्सुश हुआ..डर था कहीं लोकतंत्र भी तानाशाही में न बदल जाये..आँखों के सामने लीबिया, मिस्त्र, सीरया, अफ्गानिश्तान, इराक और न जाने कितने ही देशों का वर्तमान का चित्र आजाता था..फिर याद आया अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का इसी साल भारतीय संसद में दिया हुआ भाषण.." मेरी नजरों में भारत एक विकसित राष्ट्र बन चूका है और ये सब संभव हुआ हैं भारतीय लोकतंत्र के बिना पर" मन को एक और ढाढस मिला...