2016 में हुई विमुद्रीकरण भारतीये अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक अनूठा प्रयोग और प्रयास है , प्रयोग इस कारण की जहाँ एक ओर इतने बड़े स्तर पर विमुद्रीकरण का कोई मिसाल मिलना मुश्किल है वहीँ दूसरी ओर इसके परिणाम अथवा दुष्परिणाम भी बहुत स्पष्ट नहीं थे , प्रयास इसलिए क्योंकि अपेक्षित सफलता की कोई सुनिश्चिता नहीं थी। इस प्रयास के बहुतेरे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ गिनवाये गए । जहाँ सबसे महत्वपूर्ण लाभ आर्थिक दृष्टिकोण से हैं जैसे की कालेधन को मुख्यधारा में लाना और उन पर आयकर लगाना , मुद्रास्फीती के दर को काम करना , राजकोषीय घाटा के दर को कम करना , वहीँ दूसरी ओर सुरक्षा के दृष्टिकोण से नकली नोटों को खत्म करना और संग-संग आतंकवाद , उग्रवाद और नक्सलवाद पर लगाम लगाना , तथा सामजिक दृष्टिकोण से सरकारी तंत्र में बढ़ते घुसखोड़ी को नियंत्रित करना , इत्यादि। इस प्रयास के सफलता- असफलता का सम्यक रूप से विश्लेषण तो केवल आने वालों दिनों में ही किया जा सकता है लेकिन एक कम नगद वाले अर्थतंत्र , कालाधन को किस तरह प्रभावित करता है , इस पर तो चर्चा किया ही जा सकता है। यहाँ दो मुख्य विंदु...
एक सोच इंसानियत की, एक राह सत्य की, एक रिश्ता विश्वास का, एक गीत प्रेम का, एक संदेश एकता का, एक धर्म मानवता का, एक शक्ति सहिष्णुता की, एक दृष्टि भविष्य की, एक पथ जीत का, एक आवाज़ आम आदमी की !