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कम नकदी वाला अर्थतंत्र और कालाधन

2016 में  हुई विमुद्रीकरण भारतीये अर्थव्यवस्था के इतिहास में एक अनूठा प्रयोग और प्रयास है, प्रयोग इस कारण की जहाँ एक ओर इतने बड़े स्तर पर विमुद्रीकरण का कोई मिसाल मिलना मुश्किल है वहीँ दूसरी ओर इसके परिणाम अथवा दुष्परिणाम भी बहुत स्पष्ट नहीं थे, प्रयास इसलिए क्योंकि अपेक्षित सफलता की कोई सुनिश्चिता नहीं थी।  इस प्रयास के बहुतेरे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ गिनवाये गए ।  जहाँ सबसे महत्वपूर्ण लाभ आर्थिक दृष्टिकोण से हैं जैसे की कालेधन को मुख्यधारा में लाना और उन पर आयकर लगाना, मुद्रास्फीती के दर को काम करना, राजकोषीय घाटा के दर को कम करना, वहीँ दूसरी ओर सुरक्षा के दृष्टिकोण से नकली नोटों को खत्म करना और संग-संग आतंकवाद, उग्रवाद और नक्सलवाद पर लगाम लगाना, तथा सामजिक दृष्टिकोण से सरकारी तंत्र में बढ़ते घुसखोड़ी को नियंत्रित करना, इत्यादि।
इस प्रयास के सफलता- असफलता का सम्यक रूप से विश्लेषण तो केवल आने वालों दिनों में ही किया जा सकता है लेकिन एक कम नगद वाले अर्थतंत्रकालाधन को किस तरह प्रभावित करता है, इस पर तो चर्चा किया ही जा सकता है।
यहाँ दो मुख्य विंदु हैं कम नगद और कालाधन । मुद्रा व्यवस्था किसी भी आधुनिक अर्थतंत्र का रीढ़ होता है, सभी प्रकार का कारोबार, व्यवसाय अथवा किसी भी प्रकार का आर्थिक क्रियाकलाप का आधार वहाँ प्रचलित मुद्रा ही होता है। इतना महत्वपूर्ण और उपयोगी होते हुए भी मुद्रा व्यवस्था की कुछ सीमाएं होती हैं और मुद्रा से जुडी कुछ विसंगतियां।
इन सभी विसंगतियों में सबसे प्रमुख है नगदी का कालाधन का मुख्य श्रोत । कलाधन भी आर्थिक क्रियाकलापों से ही सृजित होता है। ये ऐसे अर्जित धन होते हैं जिसे सरकारी तंत्र से छुपा कर रखा जाता है ताकि इस पर आयकर अदा नहीं करना पड़े। नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) के मुताबिक, काला धन वह आय  होती है जिस पर कर की देनदारी बनती है लेकिन उसकी जानकारी आयकर विभाग को नहीं दी जाती है। कालाधन का श्रोत क़ानूनी और गैरकानूनी दोनों हो सकता है। आपराधिक गतिविधियां जैसे अपहरण, तस्करी, जानवरों का अवैध शिकार, ड्रग्स, अवैध खनन, जालसाजी और घोटाले, कर्मचारियों की रिश्वतखोरी, निजी क्षेत्र में कार्यरत लोगों द्वार किया गया जालसाज़ी इत्यादि के माध्यम से अर्जित धन कालाधन कहलाता है। ये तरीके ग़ैर क़ानूनी हैं। इस प्रकार से अर्जित धन पर, आयकर के चोरी के अलावा अन्य भारीतये वैधानिक अधिनियम जैसे - भारतीय दंड संहिता, प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, बेनामी सम्पत्ति अधिनियम इत्यादि के विभिन्न धारों के तहत भी मुकदमा चलाया जा सकता है।
वहीँ दूसरी और वैध तरीकों से अर्जित धन भी कालाधन के श्रेणी में आ सकते हैं अगर उनपर सरकार द्वार सुनिश्चित आयकर अदा नहीं किया गया हो।  जैसे अगर कोई व्यक्ति अपना घर किराये पर लगता है और उससे जो आय अर्जित करता है अगर इस आय को  वह आयकर रिटर्न में नहीं दिखलाता है तब यह धन कालाधन हो जाता है।  यहाँ इनकम अर्जित करने का तरीका वैध है लेकिन चूकिं इस पर कर अदा नहीं किया गया, यह धन, कालाधन में तबदील हो गया।  और भविष्य में जब इसकी  जानकारी  आयकर विभाग को मिलेगा तब इस पर टैक्स के साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता  है और आयकर विभाग, आयकर अधिनियम, 1961 के तहत मुकदमा भी चला सकता  है।
देश में इतने सारे नियम-अधिनियम के बावजूद यह बहुत ही दुःखद रूप से आश्र्यचकित करने वाला तथ्य है की 132 करोड़ के जनसंख्या वाले देश में केवल 5.5 करोड़ लोग आयकर रिटर्न भरते हैं, दुनिया के सबसे तेजी से वृद्धि करने वाले राष्ट्र में सुमार भारत में कर और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात मात्र 16.6 % है।  जिस देश में मात्र 24 लाख लोग ₹ 10 लाख से ऊपर का आय दिखाते हैं वह देश समृद्धशाली कैसे बन सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 5 वर्षों से भारत में प्रति वर्ष 25 लाख नए कार ख़रीदे जाते हैं जिसमें से लगभग 35,000 लक्सरी कार होते हैं।  आयकर आकड़ों  के अनुसार केवल 48,417 करदाता ने निर्धारित वर्ष 2014-15 में  ₹ 1 करोड़ या अधिक की आय पर कर दिया है। फिर भी हर साल भारत में बीएमडब्ल्यू, जगुआर, ऑडी, मर्सिडीज, पोर्श और मसेराटी जैसे 35,000 लक्जरी कारें बेचे जाते हैं। 
सबसे बड़ी बात यह है कि इतने सारे लोग आयकर नियमों को उल्घन कर के कैसे बच जाते हैं, इसके पीछे मुख्य कारण है नगदी में की गयी लेन-देन, जिसकी जानकारी बहुत आसानी से छुपाई जा सकती है। प्राइसवाटरहाउस कूपर्स ने 2015 में एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत में मूल्य के आधार पर 98 प्रतिशत और मात्रा के आधार पर 68 प्रतिशत लेन-देन उपभोक्ता नकद में करते हैं  जो की तुलनीय अर्थव्यवस्थाओं, जैसा की चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका इत्यादि से काफी अधिक है। असंगठित तो असंगठित, संगठित क्षेत्र में भी अधिकतर आर्थिक क्रियाकलाप बैंकिंग प्रणाली से बहार सामानांतर व्यवस्था के द्वारा की जाती है, ताकि इसका कोई निशान (ट्रेल) न रह जाये ताकि  कानून लागू करनेवाली एजेंसी इस लेन-देन को पकड़ न पाए।  हवाला माध्यम से देश और विदेश में रुपये भेजवाने का तरीका भारतीये उपद्वीप की अपनी खोज है।  भारत में अनगिनत लोग इस तरह के काम को अंजाम देने में लगे हुए हैं। केवल सरकारी और बड़े आद्योगिक क्षेत्र को छोड़ कर तमाम नौकरियों में वेतन/मेहनताना नगद में दिया जाता है।  मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्योगों तथा सेवा क्षेत्र में लोगों को आयकर का डर दिखा कर वेतन/मेहनताना नगद में दिया जाता है बाबजूद इसके की उनका वार्षिक वेतन आयकर छूट सीमा के अंदर होती है।  दिल्ली में कार्यरत निजी सुरक्षा गार्ड्स या ड्राइवर्स या घरेलू काम करने वाली महिलाएँ, सामान्यतयः किसी प्राइवेट एजेंसी के माध्यम से नियुक्त किये जाते हैं अतः उनका वेतन भी इन्ही प्राइवेट एजेंसीज के माध्यम से दिया जाता है।  सेवा लेने वाली संस्था न्यूनतम निर्धारित वेतनमान से ऊपर वेतन देती है जो की लगभग 15,000 -16,000 रुपये के आसपास होता है लेकिन बीचवाली प्राइवेट एजेंसी अपना कॉमिशन तो सेवा लेनी वाली संस्थान से लेती ही है  उसके साथ कर्मचारियों के वेतन का एक मोटा हिस्सा भी रख लेती है, ये एजेंसी कर्मचारी को मात्र 8,000 -10,000 रुपये देती है और उनसे पूरा वेतन पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं। शेष 5,000-6,000 रुपये अनौपचारिक रूप से बीचवाली हायरिंग एजेंसी द्वारा हज़म कर लिया जाता है।  ये उजले रुपये हमेशा-हमेशा के लिए मुख्यधारा से निकल कर कालाधन बन जाते हैं। अब यही कालधन, इन एजेंसी द्वारा अगले साल वापस कॉन्ट्रैक्ट जीतने के लिए घूस के तौर पर सेवा लेने वाली संस्थानों के अधिकारियों को दिया जाता है।  
यह हैरानी का विषय है कि 8 नवंबर 2016 के माननिये प्रधानमंत्री के घोषणा के बाद मध्यरात्रि तक सैकड़ों ज्वैलर्स दुकान वालों ने 12 बजे रात तक अपने बही खाते में हज़ारों बिल काटे और ये सभी बिल रूपये 2 लाख से काम के बिल थे ताकि पैन नंबर देने की जरुरत न पड़े।   एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के चाँदनी चौक बाजार का एक ज्वैलरी के दुकानदार ने 8 तारिक के 12 बजे रात तक 4500 से ऊपर बिल काटे थे। इस तरह कई हज़ार करोड़ की ज्वैलरी उस रात बिकी और उसके लेनदारों का पता आयकर वाले लगाने का प्रयास कर रहे हैं, जो की बहुत ही मुश्किल कार्य है क्योंकि बिल पर ग्राहकों का नाम व पता लिखा ही नहीं है।वहीँ अगर इन सब खरीदारी के लिए बैंकिंग प्रणाली का उपयोग होता तो खरीदारों के बारे में पता लगाया जा सकता है।  
सामान्य परिस्थिति में भी लोग कानून का इस तरह इस्तेमाल करते हैं की कर चोरी की जा सके, जैसा की बैंक में 50,000 रुपये  से कम की राशि में कई बार जमा करना ताकि पैन कार्ड की जरुरत न पड़े, महँगे से महँगे गहने 2 -2 लाख रूपये से कम का कई बिल बना का खरीदा जाता है।  दो पहिये वाहनों की खरीदारी मुख्य रूप से नगदी में होती है। चार पहिये गाड़ी खरीदने के लिए लोगों ने एक अनूठा तरीका निकाल रखा है जिससे आयकर विभाग के नोटिस से बचा जा सके, लोग कार खरीदने के लिए बैंक से लोन लेते हैं और फिर बैंक में इ ऍम आई  भरने के लिए अपने खाते में हर महीना कैश जमा करवा देते हैं।
गांव-घर से शहरों तक लोग मकान के किराये से अर्जित आय को या तो एकदम नहीं या काफी कम के आयकर रिटर्न में दिखाते हैं, किरायेदार से किराया कैश में लिया जाता है ताकि उसका कोई ना सबूत रहे।  दिल्ली -मुम्बई जैसे शहरों में प्रॉपर्टी का व्यवसाय काफी लाभ वाला व्यवसाय माना जाता है, अमूमन ये प्रॉपर्टी वाले अपना कमीशन नगदी में ही लेते हैं ताकि आयकर से बचा जा सके।
वैसे व्यव्सायिक प्रतिष्ठान जहाँ अमूमन प्रति ट्रांसैक्शन वैल्यू काफी काम होती है वहाँ कर चोरी का शक  पैदा  नहीं होता है  जैसे की मुम्बई में बड़ा पाव बेचने वाला, एक बड़ा पाव का कीमत रुपये 10 -15  होता है लेकिन वहाँ ट्रांसैक्शन की संख्या बहुत अधिक होने के कारण प्रतिदिन का बिक्री लाखों  में होता है।  लेकिन ये दुकानदार हमेशा ही अपने आप को कर प्रणाली से बाहर रखते हैं। और बाद में आयकर कार्यवाही के दौरान कालेधन का पता लगता है।  अभी कुछ दिन पहले आयकर विभाग ने दिल्ली के बहुत बड़े होटल श्रंखला पर जाँच शुरू किया और पाया की जहाँ डेबिट/क्रेडिट कार्ड सेल्स में कोई जोड़-तोड़ नहीं किया गया था लेकिन कैश सेल्स को  50-60 %  कम कर के आपन आयकर रिटर्न भरा जाता था यहाँ यह भी लिखना जरुरी है कि दिल्ली जैसे शहर में भी होटल में डेबिट/क्रेडिट कार्ड सेल्स मुश्किल से 30 % के आसपास होता है। 
कलाधन पर गठित जस्टिस ऐ पी शाह समिति ने अपने जाचं में पाया की शिक्षा और रियल एस्टेट का क्षेत्र कालेधन के प्रमुख श्रोतों में से हैं। दिल्ली सहित सभी शहरी क्षेत्र में रियल एस्टेट क्षेत्र में प्रॉपर्टी खरीदने के लिए कुल ताय कीमत का मात्र 30-40 % हिस्सा ही बैंकिंग चैनेल से अदा किया जाता है और शेष नगदी के तौर पर। विक्रय विलेख (सेल डीड ) पर उतना ही कीमत लिखा जाता है जो प्रॉपर्टी का सर्किल रेट होता है उतना ही रुपया बैंकिंग प्रणाली से अदा किया जाता है।  इससे बेचने वाले अपना दीर्घकालिक पूंजी लाभ कम कर पता है और इस तरह उसे कम दीर्घकालिक पूंजी लाभ कर (लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स ) अदा करना पड़ता है।  अगर इस तरह का कोई कानून बने जो आपके कैश होल्डिंग कैपेसिटी को ही नियंत्रित करे तो शायद लोगों का इस तरह से कैश में अदा करने की क्षमता कम होगी और फिर जो लोग ईमानदारी से धन कमाते हैं उन्हें अपना सफ़ेद पैसा काला करवाने  की जरुरत नहीं पड़ेगी।  इसी दिशा में 23 जून 2016 को  भारतीये रिजर्व बैंक ने "भारत में भुगतान और निपटान प्रणाली- विजन 2018" को प्रकाशित किया, जिसका मुख्या उद्देश्य है सभी वर्गों में इलेक्ट्रॉनिक भुगतान को अधिक से अधिक बढ़ावा देकर एक "कम-नगदी" समाज का निर्माण करना  है।
भारत में अक्टूबर 2016 तक 104 करोड़ डेबिट/क्रेडिट कार्ड प्रचलन में हैं और भारत में 2.1 लाख एटीएम और 12 लाख पॉइंट ऑफ़ सेल (पी ओ एस) टर्मिनल हैं फिर भी 88-90 प्रतिशत डेबिट/क्रेडिट कार्ड लेन-देन एटीएम के द्वारा होता है वहीँ मात्र 10-12 प्रतिशत लेन-देन पी ओ एस टर्मिनल पर होता है। यह हम भारतीयों का नगदी से प्रेम को दर्शाता है। 
इस तरह से ये देखा जा सकता है कि देश में मुख्यधारा अर्थव्यवस्था के साथ साथ एक सामानांतर अर्थव्यवस्था भी चलरही है जो संभवतः मुख्यधारा अर्थव्यवस्था से बड़ी है और ये सामानांतर अर्थव्यवस्था कर प्रणाली से हमेशा बच निकलती है, जिसका दुष्परिणाम ये होता है की जहाँ सरकार के पास लाभकारी योजनाओं पर खर्च करने के लिए धनराशि की कमी रहती है वहीँ ईमानदार करदाता पर कर एक बोझ सा दिखता है।  इसका दूसरा सबसे बड़ा नुकसान है की सरकार कभी भी अपने नागरिकों के वित्तए स्तिथि के बारे में सही अनुमान नहीं लग पता जिसके के कारण सरकारी लाभ, योग्य लाभार्थी तक नहीं पहुँच पता है।  इस तरह कालाधन न सिर्फ वित्तए समावेशन में एक बड़ा बाधक है बल्कि समावेशी विकास के रास्ते में भी एक प्रमुख कठिनाई है।
कलाधन न सिर्फ इसलिए गलत है क्योंकि इस पर कर की चोरी की जाती है बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह भ्रष्टाचार को भी बढ़ाबा देता है। यहाँ ये स्पष्ट होना चाहिए की भ्रष्टाचार और कालेधन में अंतर है। कालाधन जहाँ वैसे धन को कहा जाता है जिन पर आयकर नियमों के तहत कर आदायगी नहीं की गयी हो वहीँ दूसरी ओर आम तौर पर सरकारी सत्ता और संसाधनों के निजी फ़ायदे के लिए किये जाने वाले बेजा इस्तेमाल को भ्रष्टाचार की संज्ञा दी जाती है। प्रथम दृष्टिये भ्रष्टाचार और कला धन भले एक दूसरे से अलग दिखें लेकिन ये दोनों एक -दूसरे के पूरक हैं।  जहाँ एक ओर भ्रष्टाचार से कमाया गया धन को सामान्यतया पकडे जाने के डर से मुख्यधारा में नहीं लाया जाता है अतः इनपर आयकर भी नहीं दिया जाता जिसके करना ये कालेधन के श्रेणी में भी आ जाते हैं  वहीँ दूसरी और कालधन का उपयोग सरकारी तंत्रों के कमजोर कड़ी को भ्रष्ट करने के लिए किया जाता है।
भ्रष्टाचार के लिए नकद और प्रकार (कैश और काइंड ) का इस्तमाल किया जाता है अर्थातः अपना  काम करवाने के लिए लोग मजबूरन या आदतन सरकारी महकमें को घूस देते हैं।  सामान्यतयः इस प्रकार का गैरकानूनी लेन-देन नगदी में होती है कारण रुपये को छुपाना और एक जगह से दूसरे जगह ले जाना सबसे आसान होता है। नगद में किया गया लेन-देन का कैश ट्रेल पकड़ना भी मुश्किल होता है। वहीँ दूसरी ओर बैंकिंग माध्यम से किया गया लेन-देन कई स्तर के  लेन-देन (मल्टी-लेयर ट्रांसेक्शन) के बाद भी पकड़ा जा सकता है। यही कारण है की नगदी का लेन-देन कालेधन को बढ़ाबा देता है। स्पष्ट तौर पर जिस अर्थतंत्र में नगदी जितना अधिक होगा वहां घूस देना उतना आसान होगा। यही कारण है कि ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार बोधक सूची में जो राष्ट्र सबसे कम भ्रष्ट श्रेणी में गिने जाते हैं वो ऐसे राष्ट्र हैं जहाँ नगदी में लेन-देन सबसे कम होती है। साधारणतया ऐसा देखा गया है कि जिस देश की भ्रष्टाचार बोधक सूची में अच्छे रैंक उन देशों में नगदी लेन-देन 10 प्रतिशत से भी कम है। डेनमार्क, फ़िनलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, सिंगापुर, फ्रांस, यूनाइटेड किंगडम, इत्यादि ऐसे देश हैं जो ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के भ्रष्टाचार बोधक सूची में जहाँ सबसे कम भ्रष्ट राष्ट्रों में गिने जाते हैं वहीँ इन देशों में नगदी में लेन-देन, कुल लेन-देन के 10 प्रतिशत से भी काम होता है।
फिर प्रश्न उठता है क्या केवल नगदी कम हो जाने से क्या कालाधन पूर्णरूप से खत्म हो जायेगा ? शायद नहीं। कालाधन बैंकिंग प्रणाली से भी अर्जित किया जाता है  वास्तव में बड़े स्तर पर जो कर-चोरी होती है उसे बाद में मल्टी-लेयर्ड ट्रांसेक्शन के माध्यम से बैंकिंग चैनल में लाया जाता है। आयकर इतिहास में दीर्घकालिक पूंजी अभिलाभ कर घोटाला भी एक  ऐसा ही उदाहरण है।  लोग परिवार में इनकम स्प्लिटिंग (एक सदस्य के द्वारा कमाया गया आय घर के सदस्यों के बीच में इस तरह बाटं कर दिखाना की न्यूनतम कर अदा करना पड़े ) कर के भी टैक्स की चोरी करते  हैं।  लेकिन कम से कम ये रिपोर्टेड इनकम तो होती है।  सामान्य व्यवसाय में टैक्स चोरी करने के कई और तरीका में से एक तरीका है कागज़ पर कीमत अदा करने का वादा कर के भविष्य में उल्टा लेन-देन के दौरान वो कागज़ वापस ले लिया जाना  है। उदाहरण के लिए जैसे '' ने '' से आज कुछ लिया और कीमत देने के बदले  उसे एक कागज़ पर भविष्य में अदा करने का वचन लिख कर दे दिया,और  भविष्य में  '' ने '' से कुछ लिया  और उसने '' को अपने  पास रखा '' वाला कागज़ दे दिया , कुछ दिनों बाद '' ने '' से कुछ लिया और '' से प्राप्त '' वाला कागज़ वापस '' को लौट दिया। इस तरह के वृत्तिये व्यवसाय में 3 बार के ट्रांसेक्शन होने के बावजूद कोई पैसा का लेन-देन नहीं होता  और न ही  ट्रांसेक्शन पर कोई  कर ही अदा की जाती। इसी तरह से कई और भी तरीके से लोग कर की चोरी करते हैं। 
निःसंदेह किसी भी अर्थव्यवस्था में से कालाधन को पूर्ण रूपेण खत्म करना लगभग नामुमकिन सा है लेकिन इसे कम जरूर किया जा सकता है, अर्थव्यवस्था में नगदी में लेन-देन कम करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जरुरत है एक पारदर्शी और उत्तरदायी शासनव्यवस्था, ईमानदार नौकरशाही, जागरूक नागरिक, ठोस कानून व्यवस्था, नैतिक सामाजिक तंत्र इत्यादि का निर्माण कर कालेधन के खिलाफ छिड़ी मुहीम को अपने अंजाम तक ले जाने की।


ये लेख योजना पत्रिका के फ़रवरी महीना के अंक में प्रकाशित हुआ है।  

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