ये मैं नहीं कह रहा हूँ..मुझे ये भी नहीं पता है की आप ऐसा सोच रहे हैं या नहीं..राजपाल और राजतन्त्र में विरोध तो कोई नयी बात नहीं है पर..लोकपाल और लोकतंत्र में पहली बार विरोध दिख रहा है..लोकतंत्र का जन्म ही लोकपाल के लिए हुआ था फिर लोकपाल, लोकतंत्र का विरोधी कैसे?
इसी सवाल से पिछले कई दिनों से जूझ रहा था..मन में कही न कही एक डर था की क्या सही में लोकतंत्र और लोकपाल एक साथ नहीं अस्तिव्त में आसकता.. फिर याद आया बचपन में नागरिकशास्त्र के शिक्षक महोदय अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के द्वारा दिया हुआ लोकतंत्र का परिभाषा सुनते थे "लोंगो के द्वारा, लोंगों के लिए, और लोंगों का"..फिर दिल को एक रहत सा मह्सुश हुआ..डर था कहीं लोकतंत्र भी तानाशाही में न बदल जाये..आँखों के सामने लीबिया, मिस्त्र, सीरया, अफ्गानिश्तान, इराक और न जाने कितने ही देशों का वर्तमान का चित्र आजाता था..फिर याद आया अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का इसी साल भारतीय संसद में दिया हुआ भाषण.." मेरी नजरों में भारत एक विकसित राष्ट्र बन चूका है और ये सब संभव हुआ हैं भारतीय लोकतंत्र के बिना पर" मन को एक और ढाढस मिला..मन हल्का हुआ..तभी एक विशाल जन समुहं में जन लोकपाल के लिए चलाये जा रहे अभियान पर चर्चा परिचर्चा में भाग लेने का..बहुत सारे लोंगों का दलील सुना कुछ लोग लोकपाल को लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य बता रहे थे वही कुछ लोग लोकपाल को लोकतंत्र का दुश्मन..मन में फिर से डर पैदा हुआ..कही ऐसा न हो जाये की लोंगों का लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं से विश्वास उठ जाये..डर था विश्वास खोने का और फिर ख्याल आया की विश्वास से ही तो एक पत्थर शिवलिंग में परिवर्तित हो जाता है और लोग उसका पूजा आराधना करते हैं और वही विश्वास ख़त्म हो जाने से लोग बड़े से बड़े पहाड़ को भी लात मर कर निकल जाते हैं..क्या होगा अगर लोकतंत्र से लोंगो का विश्वास उठ्गाया तो..बचपन में सुनता था लोकतंत्र एक माध्यम भी है और एक लक्ष्य भी..यह माध्यम है एक ऐसे समाज का जहाँ समानता हो सामजिक, आर्थिक और राजनैतिक, जहाँ स्वतंत्रता हो बोलने और विरोध करने का, धर्मं मानने का, कर्म करने का, जहाँ सौहादर्ता हो आपस में, प्रेम अपने से , समाज से , अपने मूल्यों से और अपने देश से, जहाँ न्याय हो..मगर देश को ऐसा देख कर नहीं लगता है की यही लोकतंत्र है..फिर किस लोकतंत्र की रक्षा की बात हो रही है ? क्या होगा वैसे लोकतंत्र का जो कुछ लोंगों के जिन्दगी का माध्यम बन चूका है देश को लुटाने का?
सब कहते हैं क्या दिया इस लोकतंत्र ने, ६० साल होगये कल से आज तक में क्या बदला गया..जो गरीब थे वो और गरीब हो गए और जो धनी थे वो और धनी..हाँ बदला जरुर है कल तक विदेशियों से लड़ना परता था अपने लिए, देश के लिए आज अपनों से लड़ना पर रहा है.. कल देश में खुलेमा अंग्रेज लुटते थे आज लोग छुपा के लुटते हैं, कल तक देश का धन इंग्लैंड जाता था आज स्विस जाता है..और सब से बड़ा अंतर की कल तक देश गरीब था इसलिय हम भी गरीब थे मगर आज देश तो ९% के दर से आर्थिक कर रहा है और हम उतने ही दर से पीछे हो रहे हैं..विडंबन तो ये है की कल तक अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का हमे हक़ नहीं था और फिर भी हम ऐसा करते थे और इस लड़ाई में पूरा देश एक साथ था परन्तु आज विरोध करने का अधिकार रहने के बाद भी मुहं खोलने से पहले मुहं सिल दिया जाता है..कल तक एक आशा थी आजादी की, एक भाड़ोसा था अपनों का..आज अपने बटे हुए हैं..देश बटा हुआ हैं १ नहीं २ नहीं हजारो भाग में..अब तो बस अँधेरा ही अँधेरा नजर आरहा है..अब न बापू हैं न भगत सिंह..केवल अँधेरा..दर लगता है इस अँधेरा से, कहीं निगल न जाये लोकतंत्र को..हम को आपको !
इसी सवाल से पिछले कई दिनों से जूझ रहा था..मन में कही न कही एक डर था की क्या सही में लोकतंत्र और लोकपाल एक साथ नहीं अस्तिव्त में आसकता.. फिर याद आया बचपन में नागरिकशास्त्र के शिक्षक महोदय अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के द्वारा दिया हुआ लोकतंत्र का परिभाषा सुनते थे "लोंगो के द्वारा, लोंगों के लिए, और लोंगों का"..फिर दिल को एक रहत सा मह्सुश हुआ..डर था कहीं लोकतंत्र भी तानाशाही में न बदल जाये..आँखों के सामने लीबिया, मिस्त्र, सीरया, अफ्गानिश्तान, इराक और न जाने कितने ही देशों का वर्तमान का चित्र आजाता था..फिर याद आया अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का इसी साल भारतीय संसद में दिया हुआ भाषण.." मेरी नजरों में भारत एक विकसित राष्ट्र बन चूका है और ये सब संभव हुआ हैं भारतीय लोकतंत्र के बिना पर" मन को एक और ढाढस मिला..मन हल्का हुआ..तभी एक विशाल जन समुहं में जन लोकपाल के लिए चलाये जा रहे अभियान पर चर्चा परिचर्चा में भाग लेने का..बहुत सारे लोंगों का दलील सुना कुछ लोग लोकपाल को लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य बता रहे थे वही कुछ लोग लोकपाल को लोकतंत्र का दुश्मन..मन में फिर से डर पैदा हुआ..कही ऐसा न हो जाये की लोंगों का लोकतंत्र और लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं से विश्वास उठ जाये..डर था विश्वास खोने का और फिर ख्याल आया की विश्वास से ही तो एक पत्थर शिवलिंग में परिवर्तित हो जाता है और लोग उसका पूजा आराधना करते हैं और वही विश्वास ख़त्म हो जाने से लोग बड़े से बड़े पहाड़ को भी लात मर कर निकल जाते हैं..क्या होगा अगर लोकतंत्र से लोंगो का विश्वास उठ्गाया तो..बचपन में सुनता था लोकतंत्र एक माध्यम भी है और एक लक्ष्य भी..यह माध्यम है एक ऐसे समाज का जहाँ समानता हो सामजिक, आर्थिक और राजनैतिक, जहाँ स्वतंत्रता हो बोलने और विरोध करने का, धर्मं मानने का, कर्म करने का, जहाँ सौहादर्ता हो आपस में, प्रेम अपने से , समाज से , अपने मूल्यों से और अपने देश से, जहाँ न्याय हो..मगर देश को ऐसा देख कर नहीं लगता है की यही लोकतंत्र है..फिर किस लोकतंत्र की रक्षा की बात हो रही है ? क्या होगा वैसे लोकतंत्र का जो कुछ लोंगों के जिन्दगी का माध्यम बन चूका है देश को लुटाने का?
सब कहते हैं क्या दिया इस लोकतंत्र ने, ६० साल होगये कल से आज तक में क्या बदला गया..जो गरीब थे वो और गरीब हो गए और जो धनी थे वो और धनी..हाँ बदला जरुर है कल तक विदेशियों से लड़ना परता था अपने लिए, देश के लिए आज अपनों से लड़ना पर रहा है.. कल देश में खुलेमा अंग्रेज लुटते थे आज लोग छुपा के लुटते हैं, कल तक देश का धन इंग्लैंड जाता था आज स्विस जाता है..और सब से बड़ा अंतर की कल तक देश गरीब था इसलिय हम भी गरीब थे मगर आज देश तो ९% के दर से आर्थिक कर रहा है और हम उतने ही दर से पीछे हो रहे हैं..विडंबन तो ये है की कल तक अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का हमे हक़ नहीं था और फिर भी हम ऐसा करते थे और इस लड़ाई में पूरा देश एक साथ था परन्तु आज विरोध करने का अधिकार रहने के बाद भी मुहं खोलने से पहले मुहं सिल दिया जाता है..कल तक एक आशा थी आजादी की, एक भाड़ोसा था अपनों का..आज अपने बटे हुए हैं..देश बटा हुआ हैं १ नहीं २ नहीं हजारो भाग में..अब तो बस अँधेरा ही अँधेरा नजर आरहा है..अब न बापू हैं न भगत सिंह..केवल अँधेरा..दर लगता है इस अँधेरा से, कहीं निगल न जाये लोकतंत्र को..हम को आपको !
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